अप्रैल, 2010 के लिए पुरालेख

11
अप्रैल
10

सही या गलत

जब भी आपने कोई कार्य किया हो या करने की योजना बनाई होगी तो ये शब्द आपने जरूर सुने होगें। जन्म से मृत्यु तक ये दो शब्द हमारे साथ जुड़े रहते है और हमें कई ऎसे कार्य करने से रोक देते हैं, जिन्हें करना शायद ज्यादा उचित रहता। पर क्योंकि वो दुसरों की नज़र में गलत थे इसलिए हमें करने नहीं दिया गया। और कई बार ऎसा भी होता है कि हमें वो करना पड़ता है जो हम करना नहीं चाहते, पर समाज की नज़र में वही सही है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि वास्तव में सही या गलत की परिभाषा क्या है? यह जरूरी नहीं कि जो चीज एक व्यक्ति या समूह के लिये सही हो वही सभी के लिये सही हो या जो किसी के लिये गलत हो वो सबके लिये भी गलत ही होगा। देखा जाये तो किसी चीज के सही या गलत होने का निर्धारण समय, परिस्थिति, स्थान और उद्देश्य के आधार पर होना चाहिये ना कि परंपरा या रुढियों के आधार पर। झूठ बोलना गलत है लेकिन कई परिस्थितियों में ये सही भी हो सकता है।

दरअसल प्राचीन समय से कुछ मान्यतायें चली आ रही है, जिनमें कुछ चीजों को सही और कुछ को गलत बतलाया गया है। और हमारे जन्म के साथ ही हमारे परिवार वाले, मित्र, शिक्षक, रिश्तेदार, परिचित आदि हमें ये मान्यतायें सिखाते जाते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि किसी भी विषय के लिये हम अपने खुद के विचार व्यक्त ही नहीं कर पाते। क्योंकि हमारे अंदर बैठी मान्यता हमारे सोचने से पहले ही बता देती है कि यह सही है या गलत। उदाहरण के लिये किसी गुलाब के फूल को देखते ही हम सोच लेते हैं कि यह सुदंर है। क्योंकि बचपन हम यही सुनते या पढ़ते आयें है कि गुलाब सुदंर होता है और हमने भी यही धारणा बना ली। पर वास्तव में तो हमने गुलाब की सुदंरता को महसूस ही नहीं किया। हो सकता है वो हमें सुदंर ना भी लगे। कहने का तात्पर्य यही है कि किसी भी विषय पर हमें अपने खुद के विचारों का उपयोग करना चाहिए ना कि उधार मिले विचारों का।

जो चीज कल गलत थी वो आज सही भी हो सकती है और जो कल सही थी वो आज गलत भी हो सकती है। सही या गलत की परिभाषा हर व्यक्ति के लिये अलग-अलग होती है, क्योंकि हर व्यक्ति की परिस्थितियां अलग-अलग होती है। आवश्यकता केवल अपने नजरिये की है, समाज के नजरिये की नहीं। क्योंकि समाज हमें सलाह देने के अलावा और कुछ नहीं दे सकता। और ज्यादातर मामलों में समाज आपको वही करने से रोकता है जो आपके लिये शायद और अच्छा हो सकता है। हम सभी दोहरी मानसिकता में जीते हैं। अगर कोई कार्य हम करें तो वह हमें सही लगता है लेकिन कोई और करें तो हम उसे गलत बताते हैं। ऎसा क्यों? फिल्मों में प्यार-मोहब्बत देखना हमें सही लगता है और अगर हमारे आस-पास या परिवार में कोई प्यार करे तो वह गलत हो जाता है। ये कैसी मानसिकता है? क्या यह सही है? यह तो वही बात हुई कि “आप करो तो लीला, हम करें तो चरित्र ढ़ीला”।

तो अपने अंदर बैठी धारणाओं को दूर हटाईये और अपने खुद के मौलिक विचारों को जन्म दीजिये। और फिर सोचिये कि क्या सही है और क्या गलत। यकीनन आप ज्यादा उचित निर्णय ले पायेगें।

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