25
मार्च
10

इश्क

आओ इक खेल इश्क का सिखा दें तुमको
तुम अपना दिल दो हम वफा दें तुमको
कोई यहां मरता नहीं किसी के बिना
कैसे जीतें हैं हम ये बता दें तुमको
ढूंढते फिरते हो तुम जिनको ख़्वाबों में
आओ उन्हीं खुशियों का पता दें तुमको
बहुत कर ली कोशिश तुम्हें भुलाने की
तुम ही बताओ कैसे भुला दें तुमको
होती है दुश्मन दुनिया तो होने दो
हम हर हाल में मिलेंगें जता दें तुमको
खेलो जो बाजी प्यार की हमारे साथ में
खुद हार जायें और जिता दें तुमको

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4 Responses to “इश्क”


  1. मार्च 25, 2010 को 10:54 अपराह्न

    कोई यहां मरता नहीं किसी के बिना
    कैसे जीतें हैं हम ये बता दें तुमको

    ये शेर काफ़ी अच्छा है…
    सुन्दर गज़ल.बधाई

  2. 4 AMT KP9
    अप्रैल 22, 2016 को 12:37 अपराह्न

    कुछ किस्से दिल में कुछ कागजों में आबाद रहे
    बताओ उन्हें कैसे भूले जो हर साँस में याद रहे

    AMT KP9


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