09
मार्च
10

चिलमन

चिलमन से छुप के देखते हो, पर्दा हटा क्यों नहीं देते
बादलों में छुपा रखा है जो, चांद दिखा क्यों नहीं देते

संगदिल कह्ते हो हमें, चलो ये भी मान लेते है
प्यार कहते है जिसे, तुम ही सिखा क्यों नहीं देते

चिलमन गेसुओं की भी, रोक लेती है निगाहों को
बिखरे हुये है जो रूख़सार पे, इन्हें हटा क्यों नहीं देते

बेवफ़ा का इल्ज़ाम भी दिया, और उस पर भी ये सितम
हमसे कहते हो, अपनी वफ़ा का सिला क्यों नहीं देते

कब तक रख पाओगे, खुद को दुर हमसे देखेंगे
आखि़र दिल को, इस दिल से मिला क्यों नहीं देते

नहीं जायेंगें कभी मैख़ाने, ये वादा कर तो लिया है
आप अपने रिंद को, निगाहों से पिला क्यों नहीं देते

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2 Responses to “चिलमन”


  1. 1 Anil Sen
    मार्च 9, 2010 को 3:19 अपराह्न

    dada hamaer paas chand nahi hai, nahi to hum aapko dikha dete . khair hota bhi to hum nahi dikha pate. kyo ki aap kaha aur hum kaha but aapne accha likha hai.
    aapne hi likha ya nakal mari jo bhi hai bahut accha .
    1 ward ka mining nahi samaz mai aa raha hai “rind”
    aur aage bhi accha likhate raho. mera matlab nakal karte raho.

    • मार्च 9, 2010 को 4:41 अपराह्न

      अनिल भाई ये नक़ल नहीं है। ये मैनें ही लिखा है। आपको पसंद आया इसके लिये शुक्रिया। रिंद का मतलब होता है शराबी। आपने अपना बहुमुल्य समय दिया इसके लिये आपका आभार। आशा है आगे भी ऐसे ही सह्योग मिलता रहेगा।


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